सेंधवा:माघ पूर्णिमा पर गाड़ा होली का डांडा,आखिर क्या है होली के डांडा रोपण की परंपरा

🔸सेंधवा की ड्रिमलेंड सिटी में होली के डंडे का हुआ रोपण

16 फरवरी माघ माह की पूर्णिमा पर होली का डांडा रोपण के साथ शहर में फागोत्सव की शुरुआत हुई। जिसमे शहर की ड्रीमलैंड सिटी कॉलोनी में होली के डांडा का विधि विधान के साथ पूजन कर रोपण किया गया। पूजन के पश्चात समिति अध्यक्ष दिनेश सैनी ने बताया की आज से जगह-जगह मंदिरों और कई संस्थाओं चंग और डफ की थाप पर होली के विभिन्न गीतों की बयार बहेगी। उन्होंने बताया की आज से डांडा रोपने के पश्चात होली के मंगल गीतों की शुरुआत होती है।

वही कॉलोनी अध्यक्ष कैलाश सेंगर ने बताया ग्रामीण इलाकों में शाम के समय गीतों का गायन भी होगा साथ ही एक महीने पश्चात 17 मार्च को होलिका दहन किया जायेगा।

होलिका के डांडा रोपण के दौरान अध्यक्ष दिनेश भाई सैनी, हिमांशू मालाकार,शंकर स्वामी,पवन राठौड़,सूरज सिंगोरिया, कैलाश सेंगर, गंगाराम सोलंकी, सहिते जी, नारायण राव सोनी ,कपिल रावल, धीरज जोशी,अनूप सैनी, सेवाराम मेहता, किराड़े जी,रमेश चौहान,आदि कॉलोनी के सदस्य उपस्थित रहे।

🟠क्यों गाड़ा जाता है होली का डांडा

दरअसल भारतीय पंचांग के अनुसार, होली के आठ दिन पहले होलाष्टक शुरू हो जाता है, जो होली पर्व के नजदीक आने का संकेत देता है, इस होलाष्टक की शुरुआत में लोगों द्वारा होलिका दहन करने वाली जगह पर 2 घंटे गाड़े जाते हैं जिसमें से एक डंडा होलिका का प्रतीक माना जाता है वहीं दूसरा डंडा प्रह्लाद का प्रतीक माना जाता है।

🟠ये है मान्यता

मान्यताओं के अनुसार होली का डांडा गड़ने के पश्चात शुभ कार्यों में रोक लग जाती है।आज के दिन शुभ मुहूर्त देखकर मोहल्ले के चोराहे पर होली का एक डंडा लगा दिया जाता है , डंडा रोपण के पश्चात इसके चारों ओर सूखी लकड़ियां गोबर कंडे आदि लगाई जाती है,और आखिर में होलिका दहन वाले दिन इसे जलाया जाता है ।

होलिका दहन के विशेष कंडे”होली में जलाए जाने वाले कंडे विशेष प्रकार के होते हैं जिन्हें एक विशेष नाम दिया होता है इन उपलो को भरभोलिये उपले भी कहा जाता है ,भरभोलिए (उपले) कंडे गाय के गोबर से बनाए जाते है इनकी खास बात यह होती है कि इन में छेद बने होते हैं, इन शब्दों में रस्सी डालकर माला बनाई जाती है,वही रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जलाई जाती है।भारत के विभिन्न क्षेत्रों में होलिका दहन में भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है।

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